मुसलमानों से सम्बंधित आपत्तिजनक सामग्री छापने पर राजस्थान के प्रकाशक ने लिखित माफी मांगी

जम्हूरियत न्यूज़ 

जयपुर, 24 जुलाई | कहते हैं कि किताबें अच्छा इंसान बनाती हैं और ये सच भी है मगर जब पाठ्यक्रम और पुस्तकों के माध्यम से एक पीढ़ी को साम्प्रदायिक सामग्री परोसी जाए तो वही किताबें और पाठ्यपुस्तक इंसानों के बीच विभेद और नफ़रत पैदा कर देती हैं.

ताज़ा मामला जयपुर का है जहाँ एक प्रकाशन ने बी.एड के प्रश्नोत्तर सीरीज़ में मुसलमानों से सम्बंधित आपत्तिजनक तथ्य प्रकाशित किया है. जयपुर के कुछ मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों और समाजसेवियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रकाशक से मिलकर विवादित तथ्यों की लिखित शिकायत की जिसके बाद प्रकाशक ने अपनी गलती स्वीकार करी और लिखित माफी भी मांगी है.

राजहंस प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सीरीज़ में एक प्रश्न पूछा गया है कि धार्मिक रूढ़िवादिता को ख़त्म करने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? जिसके उत्तर में कई बिंदु दिए गए हैं जिसमें मदर्से की धार्मिक शिक्षा न दी जाए , मुसलमानों को मान लेना चाहिए कि वह भी हिन्दुओं की संतान हैं तथा मुसलमानों के व्यवहार आदि से सम्बंधित अभद्र बातें लिखी गयी हैं.

जनमानस राजस्थान के पत्रकार रहीम ख़ान, मोहम्मद अंसार ख़ान, मुज़म्मिल रिज़वी, इस्लाम क़ुरैशी तथा शहाबुद्दीन साहब ने एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) के नेतृत्व में प्रकाशक से मुलाकात कर छापी गयी सामग्री को संज्ञान में लाया. जिसके बाद प्रकाशक ने अपनी गलती को स्वीकारते हुए लिखित माफ़ी मांगी और बाज़ार में वितरित की गयी किताबों को जल्द वापस मंगवाने और भविष्य में ऐसी गलती दुबारा नहीं होने का यक़ीन दिलाया.

बी.एड की विवादित सीरीज़ के पेज नंबर 22 पर प्रश्न 21. में ये पूछा गया है कि, “धर्म सम्बन्धी रूढ़िवादिता एवं पूर्वाग्रह को समाप्त करने के लिए हमें कौन-कौन से प्रयास करने चाहिए? इसके उत्तर में 7 बिंदु दिए गए हैं जो इस प्रकार हैं:

 

 

आपत्तिजनक कंटेंट 

  •  विद्यालयों, संस्थाओं, महाविद्यालयों में सभी धर्मावलम्बियों के व्यक्तियों को समान अवसर दिए जाएं.

  •  मदरसों में धार्मिक शिक्षा न दी जाए.

  •  सभी को धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया जाए.

  •  धार्मिक  भेदभाव करने वालों को कम से कम दो वर्ष की जेल होनी चाहिए.

  •  मुसलमानों को समझना होगा कि वो भी हिन्दुओं की ही संतान हैं.

  •  मुसलमान सारी दुनिया में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं फलस्वरूप उन्होंने आतंकवाद फैला रखा है, जिसे ‘जेहाद’ का नाम देते हैं, परन्तु इस प्रकार आतंक फैलाकर वो अपना वर्चस्व कायम नहीं रख सकते हैं. उसके लिए भाईचारा व सद्भाव की आवश्यकता होती है क्योंकि मृत्यु उपरान्त व्यक्ति को ‘दो गज़ ज़मीन’ की आवश्यकता होती है.

  • धार्मिक पूर्वाग्रह के कारण साम्प्रदायिकता की भावना फैलती है. विशेषकर हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदाय पूर्वाग्रह व रूढ़िवादिता के कारण संघर्षरत रहते हैं; जैसे- मूर्ति को तोड़ देना, गौहत्या कर देना, मुसलमानों पर रंग छिड़क देना, मस्जिद के सामने बैण्ड बजाना या संगीत का कार्यक्रम रखना, धार्मिक जुलूसों एवं उत्सवों में पथराव करना आदि. इसी साम्प्रदायिकता के कारण अंग्रेज़ भारत में अधिक दिनों तक टिके रहे और देश का विभाजन हो गया, जिससे पूरे देश में दंगे भड़क उठे. अलीगढ़, बनारस आदि जगहों पर धार्मिक साम्प्रदायिकता का भौंडा नृत्य देखने को मिलता है. इस प्रकार धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण संघर्ष आये दिन उत्पन्न होते रहते हैं.

 

 राजहंस प्रकाशन ने लिखित माफ़ी में लिखा है:

“राजहंस प्रकाशन द्वारा पिछले 50 वर्षों से B.Ed. की पुस्तकों का प्रकाशन निरंतर किया जा रहा है. हमारे द्वारा “स्वयं की समझ” की B.Ed. वन वीक सीरीज़ में पेज नंबर 22 पर स्थित प्रशन संख्या- 21 के उत्तर में त्रुटिवश समुदाय विशेष पर आपत्तिजनक तथ्य छप गए हैं. इस पर हम खेद व्यक्त करते हुए क्षमाप्रार्थी हैं. हमारा किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का इरादा नहीं है. यह लेख हमने ठाकुर पब्लिकेशन, लखनऊ की पुस्तक “स्वयं की समझ” के पेज नंबर 142 व 43 से रिफरेन्स के रूप में लिया था. उपरोक्त वन वीक सभी पुटक विक्रेताओं से वापस मंगवाई जा रही है. हमारे द्वारा भविष्य में इस तरह की कोई गलती नहीं की जाएगी.”

निवेदक
प्रबंधक
राजहंस प्रकाशन, जयपुर

राजहंस प्रकाशन द्वारा लिखित माफ़ीनामा 

अपने लिखित माफ़ीनामे में राजहंस प्रकाशन ने कहा है कि आपत्तिजनक सामग्री “स्वयं की समझ” पुस्तक से लिया गया है जिसे लखनऊ के ठाकुर पब्लिकेशन ने प्रकाशित की है.

APCR ने अपने बयान में कहा है कि, “राजहंस प्रकाशन ने ये सुनिश्चित किया है कि वो बाज़ार सेउपरोक्त वन वीक सीरीज़ सभी विक्रेताओं से वापस मंगवाई जा रही है और वो भविष्य में इस तरह की गलती नहीं करेंगें. इसकी सूचना ठाकुर पब्लिकेशन हेड ऑफिस लखनऊ को दे दी गई है. हम ठाकुर पब्लिकेशन लखनऊ से भी मिलेंगें.”

ज्ञात हो की इससे पूर्व भी राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों में विभिन्न सरकारों द्वारा इतिहास के साथ छेड़-छाड़ की जाती रही है जिसपर सवाल भी उठता रहा है लेकिन बी.एड. की प्रश्नोत्तर सीरीज़ में इस प्रकार की अभद्र भाषा और धर्म विशेष की भावना को आहत करने की सामग्री प्रकाशित कर के आख़िर क्या सन्देश देने की कोशिश की जा रही है ये तो वही बताएगें जो इसके ज़िम्मेदार हैं मगर क्या ऐसी सोच समाज की एक नई पीढ़ी को उग्र और हिंसक नहीं बनाएगी?