सीरिया के भविष्य पर कुर्द अलगाववादी संगठनों और तुर्की के बीच टकराव 

सीरिया के भविष्य पर कुर्द अलगाववादी संगठनों और तुर्की के बीच टकराव 

 

-डॉ० ओमैर अनस

(असिस्टेन्ट प्रोफ़ेसर, अंकारा यिलिदिरिम युनिवर्सिटी, तुर्की )

 

पश्चिमी एशिया में कुर्द आबादी की समस्या बहुत पुरानी और बहुत बड़ी है. लेकिन इस समस्या का समाधान किसी के पास नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि 1920 के आसपास जब उस्मानी ख़िलाफत को खत्म किया गया उस ज़माने में अमेरिका और यूरोपीय ताकतें जिन्होंने उस्मानी खिलाफत पर कब्ज़ा कर रखा था, उस्मानी ख़िलाफत को तकरीबन 30 अलग-अलग मुल्कों में बांटा तो उस वक्त उन्होंने कुर्द आबादी की समस्या को नज़रअंदाज़ कर दिया. उस वक्त भी कुर्द आबादी की तरफ से एक अलग स्टेट बनाए जाने की मांग उठी थी, लेकिन उसको पूरा नहीं किया गया.

 

उस वक्त इराक़ और सीरिया को एक अलग देश बनाया गय। यूरोप से  यहूदियों को लाकर इस्राएल भी बनाया गया। लेकिन कुर्दों की आबादी तकरीबन चार अलग अलग देशों में बट गई। सबसे ज़्यादा आबादी, लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी तुर्की के अंदर है। 60 लाख की आबादी ईरान के अंदर है। इसी तरह इराक के अंदर भी बहुत बड़ी आबादी है और सीरिया के अंदर लगभग 20 लाख की आबादी है।

 

इस तरह से चार करोड़ का एक बड़ा समाज चार अलग-अलग देशों में रह रहा है। खुद तुर्की के अंदर भी कुर्द आबादी सिर्फ उसके दक्षिण के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सबसे ज्यादा इस्तांबुल में है जो तकरीबन 20 लाख है।

 

इन चारों देशों में कुर्द आबादी को समस्याएं अलग अलग है। लेकिन तुर्की में एक धर्मनिरपेक्ष संविधान और सरकार होने की वजह से कुर्द आबादी को शिक्षा, नौकरी और राजनीति में बराबर को भागेदारी मिली। करीब सौ से अधिक संसद कुर्द पृष्ठभूमि के है। लेकिन बाकी देशों में कुर्द आबादी का दमन हुआ, खास कर इराक में सद्दाम हुसैन के ज़माने में और ईरान में इस्लामी क्रान्ति के बाद उनका बहुत दमन किया गया।

 

अस्सी की दहाई में सीरिया और इराक के हालात के चलते कुर्द अधिकारों के लिए वामपंथी विचारधारा के तहत कुर्द नेताओं आंदोलन शुरू कर दिए। इन आंदोलनों में तुर्की के अब्दुल्ला ओजलान कुर्दों के बड़े वैचारिक नेता के रूप में उभर कर आए और उन्हें सभी चारों देशों में कुर्द अधिकारों के आंदोलन का सबसे बड़ा नेता मान लिया गया। सद्दाम हुसैन के कुर्दों के खिलाफ नरसंहार के बाद बड़ी संख्या में कुर्द तुर्की में शरण लेने पर मजबूर हुए। वहीं तुर्की में कुर्द भाषा को लेकर तुर्क राष्ट्रवाद ने तुर्की भाषा के अलावा सभी भाषाओं को मान्यता देने और शिक्षा माध्यम बनाने या उन भाषाओं में अखबार और टीवी चलाए जाने को प्रतिबंधित कर रखा था। तुर्की के उग्र राष्ट्रवाद के चलते दक्षिण में रहने वाले कुर्द आबादी कहीं ना कहीं विकास की मुख्य धारा से अलग होरहा था। लेकिन दूसरे शहरों में रहने वाले कुर्द तुर्क आबादी के साथ इतना घुले मिले थे कि वहां शिकायते इतनी मुखर नहीं थीं।

 

अस्सी की दहाई का ये आंदोलन उस वक़्त उग्र होने लगा जब बाक़ी कई देशों के वामपंथी गोरिल्ला संघर्षों से तुर्की इराक, ईरान और सीरिया के कुर्द संगठनों ने भी अपने अपने राज्यों के खिलाफ हथियार उठाने लगे और समाजी और आर्थिक अधिकारों से ऊपर अलग देश की मांग करने लगे। तुर्की नाटो का सदस्य होने की वजह से एक बड़ी सैन्य शक्ति बन चुका था अता वहां के उग्र राष्ट्रवादी सैन्य अफसरों ने तुर्की के अंदर अब्दुल्ला ओजलन के संगठन पीकेके को प्रतिबंधित कर अमरीका और यूरोप के देशों द्वारा भी उसे प्रतिबंधित कराने में सफल हुए। लेकिन पीकेके की हिंसक घटनाएं रुकी नहीं।

 

रजब तय्यब एर्डवान की ए.के.पार्टी ने वादा किया कि अगर वह सत्ता में आए तो वे कुर्दिश भाषा का  सरकारी चैनल भी खोलेंगे और स्कूल चलाने कि इजाज़त भी देंगे. 2002 में जब अर्दगान ने चुनाव जीता था, उस समय सबसे ज़्यादा वोट उन्हें कुर्दिश इलाकों से मिले थे और फिर उन्होंने कुर्द आबादी के इलाकों में विकास के बहुत से नए काम किए। एर्दवान के कार्यकाल में तुर्की के कुर्दों की समस्या अब सामाजिक या आर्थिक ना होकर केवल एक राजनीतिक समस्या के तौर पर रह गई है कि उनको राजनीतिक रूप से ज़्यादा सशक्त बनाया जाय।

 

इसके लिए 2013 के आसपास रजब तय्यब अर्दगान की सरकार और कुर्दों की तरफ से खुफिया तौर पर समस्या के समाधान के लिए बातचीत शुरू की गई। लेकिन इस बीच सीरिया में असद विरोधी आंदोलन में अमरीका ने सीरिया के कुर्द संगठनों को भरोसा दिलाया कि वह अगर असद के खिलाफ लड़ेंगे तो उनके लिए सीरिया में अलग राज्य बनाने का ये अच्छा मौका है। कुर्द संगठनों ने असद विरोधी संगठनों से खुद को अलग करके अपना प्रभाव सीरिया के उत्तर पूर्व में रखा और असद की सेनाओं को भी सुन्नी संगठनों से लडने के लिए कुर्द इलाकों से सेनाएं हटानी पड़ीं। इस प्रकार से कुर्द संगठनों को ऐक बहुत बड़ा इलाका बगैर लड़े हासिल होगया था। इस बीच इस्लामी स्टेट का संगठन खड़ा होने लगा तो अमरीका और यूरोप में कुर्द संगठनों को भारी हथियारों की सप्लाई शुरू करदी।

 

ये समय था जब तुर्की ने अमरीका से कहा कि सीरिया में जिन कुर्द संगठनों को वह हथियार और प्रशिक्षण दे रहे हैं वह अलग देश की मांग करने वाले पीकेके से संबंधित है। तुर्की की मांग थी कि या तो अलगाववादी संगठनों को इस्लामी स्टेट के खिलाफ लड़ाई में मुख्य भूमिका ना दी जाय या फिर लड़ाई के बाद उनसे हथियार वापस लें लिए जाएं और उन्हें फौजी शक्ति बनने से रोका जाय। इस बात पर अमरीका और यूरोपीय देश जो तुर्की के साथ नाटो के मेंबर है के बीच मतभेद गहरे होते गए। ओबामा प्रशासन ने तुर्की की मांगों को किनारे लगाते हुए अलगाववादी कुर्द संगठनों को हथियार देना जारी रखा। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद तुर्की ने ऐक बार फिर अमरीकी सरकार को समझाने का प्रयास किया। ट्रंप पहले से ही अफ़ग़ानिस्तान सीरिया और इराक से अमरीकी सेना को वापस बुलाए जाने का वादा कर चुके थे। ट्रंप ने तुर्की अमरीका संबंधों के बिगड़ने के लिए सीधे तौर पर ओबामा को जिम्मेदार बताया और रक्षा मंत्रालय को सीरिया में तुर्की के खिलाफ अलगाववादी संगठनों के बारे में तुर्की को विश्वास में लेने वाले कदम उठाने का आदेश दिया। लेकिन दोनों देशों के बीच 2018 में सहमति बन जाने के बावजूद पेंटागन ने उन योजनाओं को लटकाए रखा। कुर्द अलगाववादी संगठन खुले तौर पर पीकेके के नेता अब्दुल्ला ओजलान के फोटो लगाते और अपने अधीन इलाके को अलग देश के रूप में विकसित करने की दिशा में सक्रिय होने लगे। तुर्की ने आरोप लगाया कि अमरीका और यूरोप के देश तुर्की के सुरक्षा समस्याओं से अनदेखा कर रही हैं। राष्ट्रपति एर्द्वान ने ऐलान कर दिया कि अगर कुर्द अलगाववादी संगठनों को उसके सीमा इलाकों से तीस किलोमीटर दूर नहीं किया गया तो तुर्की खुद अपनी फौजी करवाई से उन्हें अपने बार्डर से तीस किलो मीटर पीछे धकेल देगा।

 

 

1974 में जब कुर्दों का एक संगठन पीकेके नाम से जब अब्दुल्ला ओजलान ने बनाया था तो उस वक्त तुर्की के अंदर अनेकों आतंकवादी हमले किए। इसकी वजह से करीब 40000 लोग मारे गए और जिसके बाद अमेरिका और यूरोपियन यूनियन ने पीकेके को एक आतंकवादी संगठन के तौर पर मान लिया था। नब्बे की दहाई में पीकेके और उसके शीर्ष नेतृत्व को सीरिया के हाफ़िज़ अल असद की सरकार ने अपने देश में पनाह दे दी। पीकेके ने ना केवल तुर्की पर अपने हमले तेज कर दिए बल्कि बहुत से संगठन बनाए जिसमें से ऐक वह है जो अभी उत्तर पूर्व सीरिया में अमरीकी सहायता से काबिज है । उस वक़्त की तुर्की सरकार ने सीरिया के खिलाफ ऐक बड़े फौजी ऑपरेशन की तैयारी करली लेकिन समय रहते इराक और अन्य देशों की मध्यस्थता से तुर्की सीरिया के बीच सहमति बन गई। सीरिया ने सभी अलगाव वादी कुर्द संगठनों और उनके नेतृत्व को सीरिया से निकाल दिया। और समझौता किया को अगर दोबारा कुर्द अलगाववादी तुर्की सीमा पर अपना केंद्र बनाएंगे तो तुर्की को अपनी सेना द्वारा करवाई का अधिकार होगा। ये समझौता अदाना समझौता के नाम से अब भी प्रभावी है। हालांकि इस वक़्त सीरिया और तुर्की के बीच पूर्ण रूप से राजनायिक संबंध नहीं है लेकिन तुर्की ने कुर्द अलगवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए इसी समझौते को बुनियाद मानता है।

 

 

ओबामा सरकार की यह मंशा थी कि वह कुर्दों की 20 लाख की जो आबादी है और उनका संगठन है उसको बड़ी मात्रा में हथियार वगैरह देकर इतना ताकतवर बना दें कि वह अपने आप में एक बड़े राज्य के तौर पर स्थापित हो जाए और उसे ना तो बशरुल असद की ज़रूरत पड़े और ना ही तुर्की की, ताकि वह एक अलग देश के रूप में अपने आप को स्थापित कर लें।

 

यह वही मॉडल था जो अमेरिका ने इराक में सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद एक अलग कुर्दिस्तान बना करके एक स्वशासित इलाके के तौर पर विकसित किया था। दो साल पहले जब इराक के  इस कुर्दिस्तान वाले हिस्से ने जब अपना एक अलग राज्य अलग देश बनाने के लिए रेफरेंडम किया था और रेफरेंडम को बड़ी मात्रा में वहां के लोगों ने वोट देकर समर्थन किया था तो उस वक्त तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया सभी देश इस बात पर समर्थित हो गए थे कि इस तरह से किसी एक नए देश को बनाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। क्योंकि अगर वह इस तरह की इजाज़त देते हैं तो फिर वह कुर्द जो ईरान, तुर्की, और  सीरिया में रहते हैं, इन सभी को ले कर एक अलग देश बनाने की मांग ज़ोर पकड़ने लगेगी और ये चारों देशों का स्थायित्व कमज़ोर हो जाएगा। इस वजह से चारों देशों में एक ये समझ बन गई कि वो ऐसा कुछ नहीं होने देंगे।

 

दो साल पहले जब इराक के स्वयं शासित कुर्दिस्तान प्रदेश ने अलग देश बनने के लिए केंद्रीय सरकार के खिलाफ जाकर रेफरेंडम कराया तो सिरिया इराक ईरान और तुर्की एक होकर इस के खिलाफ होगे। इराक ने केंद्रीय सैनिक बल भेज कर किरकुक कंट्रोल में कर लिया  इस रेफरेंडम ने सभी चारों देशों की नींद उड़ा दी थी। लेकिन पश्चिमी देश पर्दे के पीछे से खेल रहे थे। तुर्की और अमेरिका के बीच में अविश्वास की ऐक मात्र वजह यह है कि अमरीका तुर्की को ये समझाने में विफल है कि अमरीका और यूरोपीय ऐक नए देश के बनाने की मांग का समर्थन नहीं करेंगे। 2016-17 के बीच बहुत सारी आतंकी घटनाएं हुईं जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए और इसमें से बहुत सारे आतंकी हमलों का आरोप पीवाईडी यानी पीकेके से जुड़े हुए सीरिया में बैठे आतंकी संगठनों के ऊपर लगाया गया।

 

तुर्की ने ये मन बना लिया था कि वह सीरिया में आदाना समझौता के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए एक फौजी कार्रवाई करके पीवाईडी और पीकेके समर्थित संगठनों का कंट्रोल ख़तम किया जाएगा।

 

लेकिन तुर्की ने अपने फौजी दखल से पहले जमीन तैयार करने लिए रूस और ईरान के साथ मिलकर सिरिया को ऐक राष्ट्र बने रहने के नीति पर सहमति हासिल करली और आस्ताना शांति प्रक्रिया के द्वारा सिरिया में अमरीकी और यूरोपिय देशों के सीरिया में अमल दखल को हाशिए पर लगा दिया है। तुर्की ने इस बात का ऐलान कर दिया कि अगर अमेरिका उनका साथ नहीं देगा तब भी वे वहां पर कार्रवाई ज़रूर करेंगे। इस बीच अमेरिका और तुर्की के बीच में बहुत सारे दौर की जो बातचीत हुई है उसमें यह तय पाया कि अमेरिका तुर्की के साथ ज्वाइंट पेट्रोल करेगा। वहां तुर्की की फौज को ले जाएगा और उनको दिखाएगा कि वहां के जो कुर्दिश संगठन के लोग हैं वो तुर्की के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे और तुर्की को ये आश्वासन दिया जाएगा कि वहां के संगठन के द्वारा तुर्की की सुरक्षा को निशाना बनाने वाला कोई काम वहां से नहीं किया जाएगा।

 

इसके बाद यह भी दोनों देशों के बीच में तय हुआ कि एक सेफ ज़ोन कॉरिडोर बनेगा ( तुर्की के बॉर्डर के नीचे एक 30 किलोमीटर और पूरे तकरीबन 150 किलोमीटर की लंबाई और 30 किलोमीटर की गहराई में एक सेफ ज़ोन) जिसमें से पीकेके से जुड़े हुए जितने भी लड़ाके हैं उनको हटा दिया जाएगा। उसमें सिर्फ अमेरिकी और तुर्किश फौजियों को ही रखा जाएगा या फिर सीरिया के अरब आबादी के फौजियों को रखा जाएगा लेकिन पीकेके से संबंधित लड़ाकों को वहां रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

 

यह समझौता भी अमेरिका और तुर्की के बीच में हो गया लेकिन एक साल होने के बाद भी इस समझौते को अमल में नहीं लाया गया। पिछले साल अप्रैल (2018) में ट्रंप ने इस बात का ऐलान किया कि वह इस तरह का सेफ ज़ोन बनाने जा रहे हैं और वहां से अमेरिका की फौज को हटा भी लेंगे लेकिन इसके बावजूद भी उस पर अमल नहीं किया गया।

 

लेकिन ट्रंप और अर्दगान के बीच में जो समझौता हुआ वह कभी भी लागू नहीं किया जा सका। ट्रंप अपने ही मंत्रियों और प्रशासन से खिन्न थे। उन्होंने आखिर कार अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सीरिया से अमरीकी सेना को फौरन हटाए जाने का आदेश जारी कर दिया।इससे तुर्की को अमरीका की ओर से सिरिया के अलगावादी कुर्द संगठनों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए ग्रीन लिए माना गया।

 

तुर्की के अंदर सीरिया के चालीस लाख शरणार्थियों का आर्थिक दबाव अब राष्ट्रपति एर्डवान् के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों का बड़ा हथियार है। एर्डवान् का राजनीतिक समीकरण लगातार बिगड़ता जा रहा है। पिछले दिनों वो इस्तांबुल, अंकारा, इज्मीर का महानगरपालिका के चुनाव बुरी तरह से हार गए हैं। उनपर दबाव है कि जल्द  से जल्द सीरिया की समस्या का समाधान भी करें और जो रिफ्यूजी तुर्की  के अंदर रह रहे हैं उनको वापस उनके देश में भेजने के लिए माहौल बनाया जाए।अगर सीरिया के उत्तर पूर्व में कुर्दिश संगठनों का कंट्रोल ख़तम करके वह सेफ ज़ोन बनाने में सफल होते हैं तो वह एक तीर से दो निशाने लगा पाएंगे।

 

अमेरिका और यूरोपीय देशों के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि पीकेके समर्थित संगठन के साथ उन्होंने जो समझौता किया है उसको कानूनी तौर पर कोई मान्यता हासिल नहीं है. उनकी अपने देश में, अमेरिका की कांग्रेस में, यूरोपियन यूनियन में और दूसरे देशों में इस तरह के समझौते को अभी कानूनी तौर पर मान्यता नहीं मिली है. ये संगठन वह हैं जिनको दोनों देशों में दोनों जगह पर एक आतंकी संगठन के रूप में माना जाता है और सभी को  ये अच्छी तरह से मालूम है कि उसमें बड़ी तादाद में वह आतंकी संगठन है जिनको पीकेके ने यहां तैयार करके भेजा है और वहां जाकर काम कर रहे हैं. इसलिए उनके सामने सबसे बड़ा चैलेंज ये है कि वह इस कानूनी समस्या से कैसे निपटें।

 

दूसरा मामला यह है कि खुद आस्ताना शांति समझौते के जरिए जो अमल जारी रहा है उसमें  संविधान बनाने की जो कमेटी बन गई है उन सभी में अमेरिका का रोल और यूरोपीय यूनियन का रोल पीछे हो गया है और उसमें ईरान तुर्की और रूस का  रोल नेतृत्व में आ गया है.  ऐसे में जो उनके समर्थित पीकेके से जुड़े हुए  संगठनों का रोल पीछे हो गया है, वह कमजोर पड़ गए हैं। अगर वह अपने आप को एक अलग राज्य घोषित करने की ज़िद करते हैं तो उनके एक तरफ से बशरुल असद की सरकार है दूसरी तरफ से इराक़ की, तीसरी तरफ से ईरान की, चौथी तरफ से ख़ुद तुर्की की सरकार है। अगर इन सभी लोगों ने यह कहा कि वह इस तरह के देश को नहीं पनपने देंगे तो फिर अमेरिका के सामने सिवाय इसके कोई रास्ता नहीं होगा कि वह इसको छोड़ कर चला जाए क्योंकि कानूनी तौर पर उनको इस बात की इजाज़त नहीं होगी कि वह एक ऐसे संगठन के साथ मिलकर खड़े हो जिन्हें खुद उनके देश और यूरोपिय यूनियन में आतंकी घोषित किया गया हो. इस तरह के किसी भी समझौते को लेकर के बहुत दिनों तक चलना संभव नहीं था. इसी का फायदा तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यब अर्दगान ने भी उठाया है और वह दबाव बनाने में कामयाब हुए हैं.

 

इसमें कोई शक नहीं है कि तुर्की वहां पर एक फ़ौजी करवाई कर सेफ जोन जरूर बनाएगा। तुर्की की फौज नाटो की दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी और मज़बूत फौज है और वह बहुत ही प्रशिक्षित है। इससे पहले जब साइप्रस के मुद्दे को लेकर अमेरिका और तुर्की के बीच में बहुत ही ज्यादा मतभेद हो गए थे तो तुर्की ने अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को किनारे लगाकर अपनी फ़ौजे साइप्रस में भेज दी थी। तुर्की की फौज  उग्र राष्ट्रवाद से जन्मी है। कई मामलों में तुर्क सेना अपनी राजनीतिक पार्टियों से अलग मत रखती हैं और वो सरकार के सामने भी नहीं झुकती। इसीलिए सीरिया मामले पर तुर्की सेना और पार्टियों के बीच मतभेद रखने की हिम्मत ना राष्ट्रपति एर्डवान में है ना दूसरी पार्टियों में। तुर्की की सारी पार्टियां इस वक़्त एक मंच पर आ गई हैं और उन्होंने अमेरिका और यूरोपीय के खिलाफ कई सारे बयान दिए हैं।

 

तुर्की फौरन पूरे इलाक़े में जाने के बजाय धीरे-धीरे विस्तार करेगा। पहले वह सिर्फ एक छोटे से इलाक़े में, जिस पर पहले समझौता हुआ था, जो तकरीबन 30 किलोमीटर और 70 किलोमीटर की लंबाई तक का है, वहां जाएंगे और अपने आप को मज़बूत करेंगे और फिर धीरे-धीरे वह पूरे इलाके तक सेफ ज़ोन फैलाया जा सकता है

 

इस ऑपरेशन से इरान, सीरिया और रूस तीनों ही अंदर अंदर खुश हैं लेकिन बाहर से वह ये कहने पर मजबूत है कि ये ऑपरेशन करने का अधिकार सीरिया की असद सरकार को है। ये तीनों देश सीरिया को एक राज्य के रूप में देखना चाहते हैं जो अमरीका के वहां बने रहने तक संभव नहीं था।

 

इस वक़्त पीकेके से जुड़े हुवे संगठन के सामने एक ही चारा बचता है कि वह तुर्की से बातचीत करके कोई रास्ता निकाल लें या दूसरा यह है कि वह लड़ाई करें या तीसरा रास्ता यह है कि वह सीरिया की बशरुल असद की सरकार से कोई सहायता लें। तीनों ही विकल्पों में अलगाववादी संगठनों को सीरिया की स्वायतता और क्षेत्रीय अखंडता के सवाल पर अलग देश बनाने के अपने एजेंडे से पीछे हटना होगा।

 

(डॉ० ओमैर अनस ने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) से वेस्ट एशियन स्टडीज़ में रिसर्च किया है और मध्य पूर्व मामले की जानकार हैं. वर्तमान में तुर्की की Ankara Yildirim Beyazit University, Turkey में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.)

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