UAPA के तहत छात्रों की गिरफ्तारी प्रतिरोध की आवाज़ को ख़त्म करने की साज़िश है: बुद्धिजीवियों ने कहा

जम्हूरियत न्यूज़

नई दिल्ली, 22 मई | दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले छात्रों और सामजिक कार्यकर्ताओं की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी और उनपर UAPA जैसे क़ानून के तहत मामला दर्ज किए जाने को लेकर गुरुवार को देश के मशहूर सामजिक कार्यकर्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता, और बुद्धजीवियों ने ज़ूम एप्प के ज़रिए ऑनलाइन पत्रकारों को अपने विचार व्यक्त किए और दिल्ली पुलिस की कार्यवाही को असंवैधानिक बताया.

 

ऑनलाइन पत्रकारों को संबोधित करने वालों में में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, राज्य सभा सांसद प्रो० मनोज झा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो० अपूर्वानंद, मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़, मुस्लिम मुशावरत के अध्यक्ष नावेद हामिद, सोशल एक्टिविस्ट कविता कृष्णन और जमाअत इस्लामी हिन्द के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो० मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने पत्रकारों को अपने विचार साझा किए. यूनाईटेड अगेंस्ट हेट के कन्वीनर नदीम ख़ान ने इस ऑनलाइन चर्चा को मॉडरेट किया.

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो० अपूर्वानंद ने कहा कि, “कोरोना की इस महामारी में दिल्ली पुलिस छात्रों को गिरफ़्तार करने में सक्रिय है और उन्हें जांच के नाम पर या तो डरा रही है या फिर गवाह बनने के लिए दबाव बना रही है.”

 

उन्होंने कहा, “हिंसा के समय गृहमंत्रालय का ये बयान था कि ये हिंसा स्वतःस्फूर्त है. बाद में कुछ संगठनों का नाम लिया गया. और अब जाकर CAA विरोधी आन्दोलन में सक्रीय रहे छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है.”

 

अपूर्वानंद ने कहा, “इसी प्रकार भीमा कोरे गांव में भी जो लोग हिंसा भड़का रहे थे वो आज वो निडर घूम रहे हैं और निर्दोषों पर इल्ज़ाम लगाया गया है. ये ज़ुल्म का वही पैटर्न है जो हर जगह इस्तेमाल किया जा रहा है और प्रतिरोध की आवाज़ों को दबाया जा रहा है.”

 

भाजपा नेताओं की अभद्र टिप्पणियों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव के समय हिंसा को उकसाने वाले बयान दिए गए और ये बताया गया कि ये प्रदर्शन देशविरोधी हैं. नेताओं ने अपने बयाना से लोगों के लिए दंगे के लिए उकसाया लेकिन कहीं कोई पूछ गुछ नहीं हो रही है.”

 

कविता कृष्णन ने अपनी बात साझा करते हुए कहा“जो लोग भड़काऊ भाषण देने के मामले में आरोपी थे उनके बारे में दिल्ली के एक जज ने कहा था कि जब उनकी गिरफ्तारी होगी तभी हिंसा रुकेगी. प्रधानमंत्री ने कहा था कि अभी सही समय नहीं है मगर तीन महीने बाद भी उनकी गिरफ्तारी का समय नहीं आया. सही समय कब आएगा कहना मुश्किल है.”

 

कविता कहती हैं, “छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर UAPA जैसे क़ानून के तहत कार्यवाही की जा रही है जिसमें बिना सुबूत के लोगों को गिरफ्तात किया जा रहा है. छात्रों और युवाओं को गिरफ्तार किया जा रहा है.”

 

कोरोना जैसी महामारी के समय की जा रही गिरफ्तारियों पर उन्होंने कहा, “बीमारी के समय राजनीतिक कैदियों को रिहा करने का आदेश था लेकिन यहाँ लोग जेल में डाले जा रहे हैं. कुछ लोगों को आइडेंटिफाई कर के उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.”

 

मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने सरकार के दमनकारी रवैये पर अपनी बात रखते हुए पुलिस राज बताया. उन्होंने कहा, “सरकार लॉकडाउन में और महामारी के समय पुलिस राज चला रही है.”

 

तीस्ता ने कहा, “सरकार इन गिरफ्तारियों के ज़रिए मुस्लिम लीडरशिप को सख्त सन्देश देना चाहती है. सरकार मुस्लिम लीडरशिप को ये संदेश देना चाहती है कि आप को प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है। हिंसा को लेकर 700 FIR हुए लेकिन भड़काऊ भाषण देने वालों की गिरफ्तारी नहीं हुई.”

 

उन्होंने कहा, “कोविड-19  का गलत फायदा उठाकर सरकार की नीतियों और गलत क़ानून का विरोध करने वालों को गिरफ़्तरा किया जा रहा है और उन्हें डराने की कोशिश की जा रही है.”

 

तीस्ता कहती हैं, “देश ने देखा था कि संविधान और राष्ट्रीय ध्वज लेकर देश के छात्र, मुस्लिम युवा, मुस्लिम औरतें और बच्चियां लड़ाई लड़ रही हैं. संविधान बचाने की इस लड़ाई में वो सबसे आगे थे. यही बात सत्ता में बैठे लोगों को पसंद न आई.”

 

आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत के अध्यक्ष नावेद हामिद ने कहा, “पुलिस के दमन के कारण जेल में बन्द जो युवा हैं उनको हम दिल से सलाम करते हैं क्योंकि उन्होंने संविधान को बचाने के लिए संघर्ष किया है.”

 

उन्होंने कहा, “अफ़सोस इस बात का है कि इन असंवैधानिक गिरफ्तारियों पर कोई NHRC और दूसरे मनवाधिकार संगठन खामोश हैं.”

 

नावेद ने कहा, “ये बात भी अब साबित हो चुकी है कि UAPA क़ानून के तहत सबसे ज़्यादा दलित और मुसलनमानों को गिरफ्तार किया जा रहा है और उनके लिए ही ये क़ानून बनाया गया था.”

 

छात्रों और सामजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर उन्होंने कहा, “भारत का मुसलमान सरकार की दमनकारी नीतियों से डरने वाला नहीं है. आप छात्रों को गिरफ़्तार करेंगे तो और अधिक छात्र आप के सामने गिरफ्तारी देने आगे अजाएँगे. ये छात्र आप के दमन से डरने वाले नहीं हैं.”

 

राज्य सभा सांसद प्रो० मनोज झा ने कहा, “हम अपने संवैधानिक मूल्य खो रहे हैं. छात्रों की गिरफ्तारी हो रही है. वो ऐसे छात्रों को निशाना बना रहे हैं जो बहुत टैलेंटेड हैं और उनका भविष्य बर्बाद कर रहे हैं.”

 

मनोज झा ने कहा, “सरकार ने और दिल्ली पुलिस ने छात्रों की गिरफ्तारी का ऐसा समय चुना है जब देश कोरोना जैसी महामारी से लड़ रहा है और कोर्ट ठीक प्रकार से अपना काम नहीं कर पा रहे हैं.”

 

उन्होंने कहा, “ये बहुत ही भयावह है कि पुलिस बात चीत करने के लिए छात्रों को बुला रही है और फिर उनकी गिरफ्तारी कर ले रही है. पहली बार मुझे क़ानूनी लड़ाई में दिक़्क़त पेश आ रही है.”

 

जमाअत इस्लामी हिन्द के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो० मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने पत्रकारों को अपने विचार साझा करते हुए पुलिस के रवैये पर सवाल उठाया.

 

मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा, “ऐसे समय में जब सभी देशवासी इस महामारी से लड़ने में सहयोग कर रहे हैं, केंद्र सरकार अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को पूरा करने में लगी हुई है.”

 

उन्होंने कहा, “मैं पुलिस से भी ये कहना चाहूंगा कि वो संविधान का पालन करे न कि किसी पार्टी के एजेंडे पर काम करें. दिल्ली के दंगों में पुलिस की छवि और उनका रवैया भी साफ़ तौर पर देखने को मिला है.”

 

प्रो० मोहम्मद सलीम इंजिनियर ने कहा, “जो कोई भी सरकार की गलत नीतियों पर सवाल उठा रहा है सरकार उसे गिरफ़्तरा कर रही है. सरकार सोचती है कि आवाज़ उठाने वालों को गिरफ्तार कर के हम उनका मुंह बंद करा देंगे मगर सरकार शायद गलत सोच रही है.”

 

पुलिस की मंशा पर सवाल उठाते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा, “पुलिस को ईमानदारी से किसी पार्टी के दबाव में काम करने के बजाए संविधान के दायरे में काम करना चाहिए क्योंकि वो संविधान के प्रति जवाबदह है न की किसी पार्टी के सामने. पुलिस को चाहिए कि वो अपने रवैये में निष्पक्षता लाए.”

 

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि ये दिल्ली दंगों कि साज़िश की जांच नहीं है बल्कि जांच की साज़िश है.

 

उन्होंने योगेंद्र यादव की बात का ज़िक्र करते हुए कहा, “योगेन्द्र ने सही कहा था कि ये दंगों के साज़िश की जांच नहीं है बल्कि जांच की साज़िश है. जिस प्रकार शांतिपूर्ण प्रदर्शन छात्रों ने किया और उसको खत्म करने के लिए बंदूकधारी गुंडों को भेजा गया ये किसी से भी छिपा हुआ नहीं है. मगर छात्रों ने प्रदर्शन को शांतिपूर्ण रखा.”

 

प्रशांत भूषण ने कहा, “दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस ने जिस प्रकार लाइब्रेरी में घुसकर बच्चों को मारातोड़ फोड़ की और सीसीटीवी को तोड़ा वो किसी से छिपा नहीं है. पुलिस का रोल साफ़ दिख रहा है मगर पुलिस की कोई जवाबदेही नहीं बन रही.”

 

लॉकडाउन में दिल्ली पुलिस द्वारा छात्रों की निरंतर गिरफ्तारी पर प्रशांत ने कहा कि कोर्ट को बंद कर के गिरफ्तारियां हो रहीं ये सही नहीं है.

साभार: इंडिया टुमारो