इंदिरा गाँधी के जीवन पर पुपुल जयकर द्वारा लिखित पुस्तक की सुमित धमीजा की समीक्षा

इंदिरा गाँधी के जीवन पर पुपुल जयकर द्वारा लिखित पुस्तक की सुमित धमीजा की समीक्षा

मैं चार बरस का था जब इंदिरा गाँधी की नृशंश हत्या उन्ही के अंगरक्षकों द्वारा कर दी गयी। मैं अपने परिवार के बड़ों से यह सुनता आया था कि अगर भारत को भ्रष्टाचार, गरीबी एवं अन्य महामारी रुपी समस्याओं से ऊपर उठाना है तो इंदिरा गाँधी जैसी साहसी प्रधान मंत्री की आवश्यकता है। नतीजन, इन सभी टिप्पणियों ने मेरे मन में हमारी दिवंगत प्रधानमंत्री की प्रेरक छवि उतार दी।

जब मैंने पुपुल जयकर की “इंदिरा गाँधी : अ बायोग्राफी ” पढ़ी, तो भावनाओं में विह्वल हो गया। राजनीती से सजग, शुरुआत में तो मैं इस पुस्तक को पढ़ने के लिए अनिच्छुक था (जो की पिछले दो सालों से मेरी अलमारी में पड़ी थी)। श्रीमती गाँधी के साथ जयकर के विशेष सम्बन्ध, उन्हें इंदिरा के व्यक्तित्व की अप्रतिम अंतर्दृष्‍टि प्रदान करते हैं। उस प्रेक्षण स्थल से पुपुल एक बेहतरीन रूपचित्रण करती हैं – जो एक ओर तो समानुभूति रखने वाला है तो दूसरी ओर निष्पक्ष है।

१९१७ में जन्मी, इंदिरा गाँधी का जीवन एक पूरी सदी के दो तिहाई हिस्से में फैला है। इस पुस्तक की कथा एक विशेष उल्लेख की मांग करती है और प्रशंसा के योग्य है। मुझ जैसे व्यक्ति के लिए जो राजनीति का तिरस्कार करता हो, इस किताब को शुरुआत से आखिर तक पढ़ना पुपुल  के उत्साहित करने वाले वर्णन के बिना संभव नहीं होता, जो आपको आखिर तक ऐसे बाँध कर रखता है जैसे सोने से पहले वाली बच्चों की कहानी। श्रीमती गाँधी के बारे में (इतने बारीकी से) लिखना एक बृहत्काय कार्य रहा होगा यद्यपि पुपुल इसके साथ पूरा न्याय करती हैं।

इंदिरा गांधी ने एक बार टिप्पणी की,” मौन एवं द्वंद्व की ओर न खींचे जाने की क्षमता, ऐसे दो हथियार हैं जो एक नेता में हने चाहिए “। श्रीमती गाँधी के पास ये दोनों ही हथियार थे और वे इतनी कुशलता से इनका उपयोग करती थीं की उनके विरोधी उन्हें (अगली चाल) समझ पाएं उससे पहले ही (क्षण भर में) वह उस पर अमल कर लेती थीं।

गलती करना मानव का स्वाभाव है…यह एक सर्वगत सिद्धांत है। किसी भी नेता का औदा कितना भी बड़ा क्यों न हो इसका मतलब ये नहीं के उससे गलतियां नहीं होती। राष्ट्रीय आपातकाल का आरोपण, अपने बेटे संजय के ऊपर आँखें बंद कर निर्भर होना (जिन्होंने परिवार नियोजन अभियान के तहत जबरन नसबंदी का पर्यवेक्षण किया) और #ऑपरेशनब्लूस्टार ऐसी कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं जिन्होंने उनकी राजनैतिक छवि को कलंकित किया। यदि मैं संचयित कर कहूं की उन्हें इस भरी कर्म के ऋण के प्राश्चित एवं पापों (ग़लतियाँ पढ़ें) के पश्चताप के लिए अपने जीवन की आहुति देनी पड़ी । फिर भी ,इंदिरा जैसे नेता शायद ही कभी पैदा हुए हों।

उनकी हत्या के एक दिन पहले श्रीमती गांधी उड़ीसा में थीं।अपने समक्ष लोगों की भीड़ का असीम सागर देख, उनकी आशाएँ, उनकी चिंताएँ, उनकी खुशियाँ और उनके दुःख के संवेदन के आभास से जैसे उनके अंदर क्षणिक आगम का समावेश हो गया (जैसे वह जानती थीं की उनका अंत समीप था)। उन्होंने कहा,  ‘मुझे परवाह नहीं है कि मैं रहती हूँ या नहीं। मेरा लंबा जीवन रहा है और अगर मुझे किसी बात पर गर्व है तो वह यह है कि मैंने अपना पूरा जीवन सेवा करने में बिताया। मुझे केवल इसपर पर ही गर्व है और किसी पर नहीं। और जब तक मुझमें जान है, तब तक मैं सेवा करती रहूंगी,और जब मैं जीवन से विदा लूंगी तो मैं कह सकती हूं कि मेरे रक्त की हर बूंद भारत को जीवन देगी और मजबूत करेगी।

२१-मई-१९९१ को इंदिरा गाँधी और उनके दोनों बेटों की अभिशप्त कहानी समाप्त हो गयी, जब इंदिरा के बड़े बेटे, पूर्व पीएम और लोकसभा में विपक्ष के नेता #राजीवगाँधी की निर्मम हत्या, मद्रास से चालीस मील दूर, श्रीपेरंबुदूर में करदी गयी, जिसमें वे एक चुनावी सभा को सम्बोधित करने के लिए उपस्थित हुए थे। मैं तब ग्यारह बरस का था और इतना बड़ा हो चुका था की एक और आकर्षक व्यक्तित्व की मृत्य पर दुःख  (यदि शोक नहीं) महसूस कर सकूँ।